प्रेस क्लब ऑफ इंडिया: पत्रकारों की हिरासत पर सवाल | Prime Assure News
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प्रेस क्लब में पत्रकारों की हिरासत पर उठे सवाल, पुलिस कार्रवाई की निंदा


प्रेस क्लब में पत्रकारों की हिरासत पर उठे सवाल, पुलिस कार्रवाई की निंदा

प्रेस क्लब में पत्रकारों की हिरासत पर उठे सवाल, पुलिस कार्रवाई की निंदा

नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026: दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने, आईडी कार्ड दिखाने के बावजूद रोके जाने और कुछ पत्रकारों के मोबाइल फोन तथा रिपोर्टिंग उपकरण जब्त किए जाने की शिकायतों के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने इस कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई है। 13 अक्टूबर को प्रेस क्लब में पत्रकारों की बैठक हुई और इसके बाद मीडिया कर्मियों ने मौन मार्च निकालकर विरोध दर्ज कराया। स्रोत

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों की?

10 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान कई पत्रकारों को पुलिस ने हिरासत में लिया था। पत्रकार संगठनों के मुताबिक, कुछ रिपोर्टर अपने प्रेस आईडी कार्ड दिखाने के बावजूद पुलिस कार्रवाई का सामना करते रहे।

इसी मामले को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI), इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स (IWPC), दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (DUJ) और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई ने चिंता जताई। इन संगठनों ने पत्रकारों की हिरासत और उनके काम में कथित हस्तक्षेप की निंदा करते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की। स्रोत

13 अक्टूबर को प्रेस क्लब में हुई बैठक में पत्रकारों ने अपने अनुभव साझा किए। इसके बाद क्लब के आसपास मौन मार्च निकाला गया। प्रेस क्लब ने कहा कि अपने पेशेवर कर्तव्य निभा रहे पत्रकारों पर हमले अस्वीकार्य हैं और इससे स्वतंत्र तथा निर्भीक रिपोर्टिंग के अधिकार को नुकसान पहुंचता है।

आईडी कार्ड दिखाने के बाद भी पत्रकारों को क्यों रोका गया?

पत्रकारों की शिकायतों में सबसे अहम सवाल यही है कि जब रिपोर्टर अपनी पहचान बता रहे थे और प्रेस कार्ड दिखा रहे थे, तब भी उन्हें हिरासत में क्यों लिया गया।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनसे आईडी कार्ड मांगे और कुछ मामलों में केवल संगठन के कार्ड स्वीकार करने के बजाय प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) कार्ड दिखाने पर जोर दिया गया। पत्रकारों ने यह भी कहा कि उन्हें कई घंटों तक रोका गया।

इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि किसी पत्रकार की पहचान और उसके पेशेवर काम का आकलन किस आधार पर किया जाना चाहिए। हालांकि, हिरासत से जुड़े प्रत्येक मामले में पुलिस का आधिकारिक पक्ष और उपलब्ध दस्तावेज भी देखना जरूरी है।

मोबाइल फोन और कैमरे छीने जाने की शिकायतें

पत्रकारों ने आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान कुछ लोगों के मोबाइल फोन और रिपोर्टिंग उपकरण पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिए। पत्रकारों के लिए मोबाइल फोन और कैमरे केवल निजी सामान नहीं, बल्कि घटनाओं की रिकॉर्डिंग, तस्वीरें लेने, वीडियो बनाने और समाचार संपादकीय टीम तक पहुंचाने के जरूरी साधन होते हैं।

कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) की 12 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, विरोध प्रदर्शन की कवरेज के दौरान कम से कम 37 पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई। रिपोर्ट में कम से कम पांच फोन जब्त किए जाने और एक पत्रकार पर फुटेज हटाने का दबाव डालने के आरोपों का भी उल्लेख है। स्रोत

ऐसी शिकायतें गंभीर सवाल पैदा करती हैं। यदि किसी उपकरण को कानूनी प्रक्रिया के तहत जब्त किया गया है, तो उसकी वजह, रिकॉर्ड और उसे वापस करने की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। वहीं, किसी पत्रकार को रिपोर्टिंग के दौरान रिकॉर्ड की गई सामग्री मिटाने के लिए दबाव डालने के आरोप की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है।

क्या है प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा पूरा मामला?

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। इन प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों की हिरासत ने समाचार जुटाने की स्वतंत्रता और पुलिस की जिम्मेदारी को लेकर बहस तेज कर दी।

पत्रकार संगठनों का कहना है कि पत्रकारों को प्रदर्शनकारियों से अलग पहचानकर उनके पेशेवर काम में अनावश्यक बाधा नहीं डालनी चाहिए। दूसरी ओर, पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है। लेकिन किसी भी कार्रवाई में कानूनी आधार, पारदर्शिता और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं।

पत्रकार संगठनों की मांग क्या है?

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और अन्य पत्रकार संगठनों ने पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की जांच, हिरासत की परिस्थितियों पर स्पष्टीकरण और जब्त किए गए उपकरणों के संबंध में जवाबदेही की मांग उठाई है।

पत्रकारों का कहना है कि प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद हिरासत में लिए जाने और रिपोर्टिंग उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक लगने से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित होती है। मामले में पुलिस का विस्तृत पक्ष और प्रत्येक शिकायत के नतीजे सामने आने के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

निष्कर्ष

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की बैठक और मौन मार्च ने पत्रकारों की सुरक्षा तथा स्वतंत्र रिपोर्टिंग के अधिकार को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आईडी कार्ड दिखाने के बावजूद हिरासत, मोबाइल फोन और कैमरे जब्त किए जाने की शिकायतों की पारदर्शी जांच जरूरी है, ताकि पत्रकारों की जवाबदेही के साथ-साथ उनके पेशेवर अधिकारों की भी रक्षा हो सके।

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